म्रां म्रीं म्रूं म्रैं
नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.
कूट: मृत्युकूट
मूल तत्व: मृत्यु, मोह, करुणा एवं असमंजस
प्रतीकात्मक स्वरूप: सिंह, बहेलिया, निर्ऋति एवं मृत्यु की चेतना
मृत्युकूट — क्या मृत्यु भी किसी से मोह कर सकती है?
ऐसा सिंह, जो हिरण पर भी मोह-ममता दिखाए!
शायद यही कारण है कि लोग मघा में मूषक ढूँढ़ते रहते हैं। किंतु प्रश्न यह है कि यदि सिंह शिकार करना छोड़ दे और साधु बन जाए, तो ऐसे सिंह से भला हिरण भी क्यों डरेगा?
मघा की सबसे बड़ी पहेली उसकी शक्ति नहीं, बल्कि उस शक्ति के प्रयोग अथवा परित्याग का निर्णय है।
मृगशिरा के संकट का निवारण यहीं से प्रारंभ होता है। जहाँ संकटा स्वयं उत्पन्न किए हुए संकटों में उलझी रहती है, वहीं मृत्युकूट उन संकटों के अंतिम परिणाम का प्रतिनिधित्व करता है।
मृत्यु के सम्मुख ग्रेनाइट जैसी कठोरता भी मोम की भाँति पिघल सकती है। स्वयं को अटल समझने वाले भी मृत्यु के समय टल जाते हैं। जिनके संकल्प पर्वत जैसे अडिग प्रतीत होते हैं, उनका अस्तित्व भी मृत्यु के एक संकेत पर परिवर्तित हो सकता है।
मृत्यु नामक इस बहेलिये को न चोरकूट रोक सकता है और न संकटा। छल, चतुराई, संकट अथवा प्रतिरोध—सभी की सीमाएँ वहाँ समाप्त हो जाती हैं जहाँ मृत्यु अपना अधिकार स्थापित करती है।
इस गूढ़ प्रतीक-व्यवस्था में निर्ऋति का अधिकृत स्वामी भी यही मृत्यु नामक बहेलिया है।
परंतु शर्त केवल इतनी है—सिंह सो रहा है या जाग रहा है?
और जागृति के पश्चात भी क्या वह वास्तव में शिकार करना चाहता है?
यही मघा का असमंजस है।
कभी उसे मुर्गे और बकरे पर दया आ सकती है। कभी वही सिंह उसी बकरे का वध करता हुआ दिखाई दे सकता है। एक ही चेतना में करुणा और संहार की दो परस्पर विरोधी संभावनाएँ विद्यमान हैं।
यह विरोधाभास केवल स्वभाव का नहीं, बल्कि शिक्षा, दीक्षा, संस्कार और प्रशिक्षण का भी विषय है।
उचित शिक्षा और दीक्षा प्राप्त सिंह अपनी शक्ति को नियंत्रित करना सीख सकता है। वह जानता है कि सामर्थ्य का अर्थ सदैव उसका प्रदर्शन नहीं होता। किसी प्राणी को मार सकने की क्षमता और उसे मारने की इच्छा दो अलग अवस्थाएँ हैं।
किंतु प्रशिक्षण के अभाव में भी सिंह शिकार करना नहीं भूलता।
उसकी मूल प्रवृत्ति सुप्त हो सकती है, समाप्त नहीं। वह लंबे समय तक शांत रह सकता है, किंतु आवश्यकता अथवा इच्छा जागृत होते ही उसका वास्तविक सामर्थ्य प्रकट हो सकता है।
मघा में जन्मे जातकों के भीतर, इस प्रतीकात्मक व्याख्या के अनुसार, भी यही द्वंद्व दिखाई देता है—अधिकार और त्याग, कठोरता और करुणा, मोह और वैराग्य, संरक्षण और संहार।
वे कभी इतने सहज हो सकते हैं कि निर्बल भी उनके समीप निर्भय हो जाएँ; कभी उनका निर्णय इतना कठोर हो सकता है कि वही निर्भयता क्षणभर में भय में बदल जाए।
इसलिए असमंजस इनके लिए एक अत्यंत उपयुक्त शब्द है।
किंतु यह असमंजस केवल दुर्बलता का प्रतीक नहीं। कभी-कभी यह उस चेतना का भी संकेत है जो अपनी शक्ति से परिचित होने के बावजूद उसके प्रयोग का औचित्य खोज रही है।
सिंह का साधु बन जाना उसकी शक्ति का अंत नहीं है। और सिंह का शिकार करना उसकी क्रूरता का अंतिम प्रमाण भी नहीं। दोनों अवस्थाओं के बीच उसकी चेतना, आवश्यकता, शिक्षा और इच्छा का निर्णय उपस्थित है।
मृत्युकूट का गूढ़ प्रश्न
यदि मृत्यु सबकी अंतिम नियति है, तो क्या मृत्यु स्वयं किसी के जीवन से मोह कर सकती है?
क्या वह किसी को देखकर अपना निर्णय स्थगित कर सकती है?
क्या जिस बहेलिये के सामने चोरकूट की चतुराई और संकटा का संकट निष्फल हो जाता है, वही बहेलिया किसी असहाय प्राणी के लिए करुणामय हो सकता है?
और यदि हो सकता है, तो क्या वह करुणा उसकी दुर्बलता है अथवा उसकी सर्वोच्च शक्ति?
मृत्यु की शक्ति केवल प्राण लेने में नहीं, बल्कि प्राण लेने का सामर्थ्य होते हुए भी उसे सुरक्षित छोड़ देने के निर्णय में प्रकट हो सकती है।
यही मघा का विरोधाभास है।
यही सिंह का असमंजस है।
और यही मृत्युकूट का सबसे गहरा प्रश्न—
क्या मृत्यु भी किसी से मोह कर सकती है?
आवेश एवं अभिव्यक्ति का असमंजस
मघा का जातक आवश्यक नहीं कि दम्भी हो। उसके स्वभाव में आवेश और तात्कालिक प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति अधिक प्रबल हो सकती है। किसी विषय का विधिवत अध्ययन, पर्याप्त अनुभव अथवा समुचित ज्ञान न होने पर भी वह उस विषय पर निःसंकोच बोल सकता है।
वह जो जानता है, उसे भी कहता है; जो नहीं जानता, उस पर भी अपनी प्रतिक्रिया देने से स्वयं को रोक नहीं पाता।
यहाँ समस्या अहंकार से अधिक विवेकपूर्ण विराम के अभाव की है। विचार के परिपक्व होने से पहले वाणी सक्रिय हो जाती है। कभी उसका कथन अत्यंत सटीक हो सकता है और कभी उसी आवेश में वह स्वयं अपने कथन का विरोधी बन सकता है।
उसका उद्देश्य सदैव किसी को नीचा दिखाना नहीं होता। कभी-कभी वह केवल अपनी तात्कालिक समझ को ही पर्याप्त मानकर बोल उठता है।
सिंह का गर्जन आवश्यक नहीं कि दम्भ का उद्घोष हो; कभी-कभी वह केवल आवेश की अनियंत्रित अभिव्यक्ति भी हो सकता है।
यही कारण है कि मघा के लिए शिक्षा, दीक्षा और अनुशासन का विशेष महत्व है। उसकी शक्ति को समाप्त करने की नहीं, बल्कि उसके प्रयोग से पहले विवेक को जागृत करने की आवश्यकता है।