ज्रैं ज्रौं ब्रां ब्रीं
नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.
बनखंडी — बनदेवी — बन्नी — बाला — बं षष्ठेश्वरी — ब्रम्हविद्या।
शांतः भयंकरि, अं अं असुरेश्वरी। सदैव बहुरूपिणी, ब्रम्हधात्री।
अमरकंटक केवल इस धरती पर ही नहीं, इस ब्रम्हांड में भी है। एक ऐसा काँटा, जो इस धरती का नासूर है। इस काँटे को धारण करने वाली देवी यही हैं।
इनका कोई पति नहीं, केवल एक पार्टनर है जिसका नाम है संकटा। मूल और मृगशिरा दोनों ही स्त्री शक्तियाँ हैं, जिनके मध्य नैसर्गिक पति-पत्नी जैसे संबंध संभव हैं। जहाँ एक ओर मृगशिरा संकटों की उत्पत्ति और उनमें उलझाने वाली शक्ति है, वहीं दूसरी ओर मूल नक्षत्र की ब्राम्ही बगलामुखी उन संकटों के विपरीत खड़ी होने अथवा तटस्थ रहकर उनका परिणाम देखने वाली शक्ति हैं। एक संकटों का जाल बुनती है, तो दूसरी उस जाल को काटने का सामर्थ्य रखते हुए भी आवश्यक नहीं कि हस्तक्षेप करे।
यही इन दोनों का विरोधाभासी किंतु नैसर्गिक दाम्पत्य संबंध है। ये देवी संकट उत्पन्न नहीं करतीं, बल्कि संकटों के विपरीत या तो खड़ी होती हैं अथवा तटस्थ होकर घटनाओं का अवलोकन करती रहती हैं। यदि ये चाहें तो धरती की आधी खर-पतवार स्वतः ही शुद्ध हो जाए और जंगली जानवर अपनी-अपनी हद में रहें। लेकिन अब ये किससे क्या कहें? इन्हें तो खर-पतवार, जहरीले वृक्ष, नाग, नेवले—सब ही चाहिए!
आपसी संघर्ष मृत्यु तक पहुँच जाएँ, तब भी इस रूपक में इनकी तटस्थता बनी रह सकती है।
अंतिम संस्कार में ये सबसे आगे रहेंगी, वह भी बिना एक आँसू बहाए। अर्थी अथवा शव को कोई हाथ नहीं लगा रहा हो, या छूने में हिचकिचा रहा हो, तो ये स्वयं आगे बढ़कर दूसरों को “Fikar not, I am here!” कहकर चिंतामुक्त कर देती हैं।
यहाँ तक तो कोई समस्या नहीं है। लेकिन जब ये किसी आतंकवादी को संरक्षण देने लगें, यह जानते हुए भी कि ऐसा करना सत्य एवं शिव की व्यवस्था के विपरीत है, तब आतंक के साथ कभी-कभी वनदेवी को भी जलना पड़ता है। शिव नाम इनके सामने “किं करोमि? क्व गच्छामि?” वाली परिस्थिति खड़ी कर देता है। भूदेवी की इस सेविका को सिखाना पड़ता है कि मानवता के शत्रु ही दानव तथा मनुष्यों के मित्र ही देव कहलाते हैं। चूँकि इनका धर्मसंकट भी बड़ा कठिन और विवादास्पद है, इसलिए इन्हें सदैव एक अपवाद के रूप में निष्पक्ष रहने का अधिकार है।
चोरकूट की जिह्वा भी इन्हीं देवी के पास है। जो वचन मुख से निकलते हैं, उन्हीं के तो सिद्ध होने की संभावना है। जो वचन मुख से निकला ही नहीं, उसकी कैसी वचनसिद्धि?
मूल नक्षत्र के जातक महाबुद्धिमान हो सकते हैं। और इस नक्षत्र में जन्मी कन्या यदि इक्कीस वर्ष की अवस्था तक स्वयं की सामर्थ्य को पहचान ले तथा निष्पक्ष रहने के बजाय स्वर्गीय व्यवस्था का पक्ष ले, तो इस आदम की धरती पर पुनः स्वर्ग स्थापित हो सकता है। नरक में तो वृक्ष एवं वनस्पतियाँ भी गल जाती हैं!
बुद्धि की स्वामिनी ब्राम्ही देवी को यह समझना होगा कि उनके लिए श्रेय क्या है।