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नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.
कूट: कालमाधव कूट (Kaalmadhav Koot)
अट्टहास एवं संवर्तक जैसे क्षरशरों को अपने भीतर समेटे हुए हस्त नक्षत्र महाराज को कंसल्टेंट की गूढ़ व्याख्या में समस्त ब्रम्हांड में प्रतिकूलता और व्यवधान का प्रबल प्रतीक समझा जा सकता है!
इन्हें साढ़ेसाती समझने की भूल नहीं करनी चाहिए क्योंकि इनसे बड़े भी एक शनीचर हैं, जो आपको पूर्वाषाढ़ के ब्रम्हषष्टा कूट में मिलेंगे। भैरव जी के अनेक श्वान-प्रतीकों में यह "हस्त" नामक कच्चा कलुवा सबसे छोटा है। सबसे छोटा होने का मतलब यह नहीं कि यह किसी की तुलना में भी कम या कमजोर है। इसके कारनामे सबसे अधिक एवं चर्चित हैं। यदि कालमाधव नाम किसी को ना समझ आए तो ठहाका लगाकर हँसने वाला कच्चा कलवा आप समझ सकते हैं।
कालभैरव की भक्ति के बिना इस श्वान का उद्धार संभव नहीं।
सड़कों पर स्वतंत्र घूमने वाला श्वान हो अथवा वातानुकूलित कक्ष में पलने वाला महँगी नस्ल का कोई श्वान—बाहरी परिस्थितियाँ भिन्न हो सकती हैं, किंतु उनकी मूल प्रवृत्तियों में अनेक समानताएँ देखी जा सकती हैं। जीवनशैली, श्वसन और आयु में वास्तविक अंतर संभव है, लेकिन इस कूट का संकेत बाहरी वैभव से अधिक आंतरिक स्वभाव की ओर है।
सामान्य धारणा है कि कुत्ते अत्यंत वफादार होते हैं। कंसल्टेंट इस धारणा से सहमत नहीं है। उसके दृष्टिकोण में श्वान की निष्ठा प्रायः भोजन, आश्रय, भय और स्वार्थ से संचालित होती है। जो रोटी देता है, उसके सामने दुम हिलाना और जो डंडा दिखाता है, उसके सामने भौंकना इसी प्रवृत्ति का प्रतीक है।
कौवे की विकृत प्रवृत्तियों को देखकर काकभुशुण्डि का तिरस्कार न करें। शुद्ध अवस्था में यही काकभुशुण्डि ज्ञान, भक्ति, विवेक और कालबोध के प्रतीक हैं। किन्तु प्रत्येक कौवा काकभुशुण्डि नहीं होता और न ही प्रत्येक काकस्वर में रामकथा का ज्ञान समाहित होता है।
हस्त नक्षत्र के जातक में जब इस कूट की ऊर्जा विकृत अवस्था ग्रहण करती है, तब वह अभावग्रस्त, असंतुष्ट और सदैव भूखे भेड़िए के समान व्यवहार कर सकता है। उपलब्ध साधनों से संतुष्ट न होना, अधिकाधिक प्राप्त करने की लालसा और स्वार्थवश संबंधों का उपयोग करना उसकी दुर्बलताएँ बन सकती हैं।
कालमाधव झील का जल वही पिए, जिसके भीतर कालभैरव जागृत हों।
इस कथन का आशय कंसल्टेंट की गूढ़ परंपरा में पात्रता, आत्मसंयम और आंतरिक जागृति से है। केवल शक्ति की इच्छा करना और उस शक्ति को धारण करने योग्य होना दो भिन्न अवस्थाएँ हैं।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक अनेकानेक सिद्धियों के स्वामी हो सकते हैं। किंतु सिद्धियों की संभावना सदाचार की गारंटी नहीं होती। कंसल्टेंट की व्याख्या में सुकर्म और आत्मसंयम के अभाव में ऐसी क्षमताओं का दुरुपयोग होने की आशंका रहती है।
इसलिए हस्त नक्षत्र के जातकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण साधना किसी नई सिद्धि की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपनी प्रवृत्तियों का परिष्कार है।
कुकर्म से बचना, असत्य भाषण का त्याग करना और आवश्यकता से अधिक न बोलना ही इनके लिए श्रेयस्कर है।
क्योंकि जिस हस्त में सृजन की सामर्थ्य है, उसी हस्त में विनाश की संभावना भी छिपी है।
कालमाधव नामक काले कुत्ते का उद्धार कालभैरव की शरण में है, किंतु उस शरण तक पहुँचने का मार्ग सदाचार और आत्मसंयम से होकर जाता है।
यह कुत्ता स्वयं एक प्रकार का छोटा शनीचर है, जो अपने एक अलग ही ब्रम्हांड का स्वामी है। इसे आप दूसरा त्रिशंकु मान सकते हैं, जिसके प्रतीक को सुरक्षा कवच के रूप में दरवाजों पर उलटा लटकाया जाता है। सीधा होने पर यह शकुनि के समान महाभारत जैसे महायुद्ध का कारण बन सकता है। इसीलिए इसके उलटे लटके रहने में ही जगत का कल्याण है।
गर्भस्थ शिशुओं को गर्भ में ही समाप्त कर देने वाले इस कालमाधव का पूजन, तर्पण एवं हवन भय के कारण किया जाता है, श्रद्धा के कारण नहीं। और जरूरी नहीं कि यह सदैव ही कालभैरव का आज्ञाकारी हो।
कमजोर शिकार को अकेला पा जाने पर यह सिंह के समान बब्बर शेर और अत्यंत खूंखार भी हो सकता है। कुज्ञान तथा सिद्धियाँ इतनी कि आश्लेषा नामक नाग को भी यह मदारी की तरह अपने पिटारे में बंद कर सकता है।
आश्लेषा तो फिर भी अपनी मृत्यु को सामने देखकर दयालु एवं भावुक हो सकता है, किंतु हस्त की हँसी के विषय में केवल इतना ही कहना पर्याप्त होगा— “केवल समझाइश नहीं, दृढ़ अनुशासन भी आवश्यक हो सकता है।”
आप इसके भीतर कालिया नाग को भी देख सकते हैं, जिसके भय से कोई यमुना के जल में प्रवेश करने का साहस नहीं करता।
इस कलवे का नियंत्रण और प्रोटोकॉल इतना विचित्र है कि पुनर्जन्म, पुनर्पीड़ा तथा पुनर्मृत्यु के चक्रव्यूह में फँसी समस्त आत्माओं को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि वे सभी इस “कुकुर शनीचर उर्फ शकुनि” के रहमोकरम पर निर्भर हैं।
यह कभी किसी को आत्मनिर्भर नहीं होने देता। दृश्य और परिस्थितियाँ ऐसी रचता है कि दुर्योधन को भी लगने लगे— “हाँ, शकुनि मामा ही मेरे सच्चे हितैषी हैं। इनसे बड़ा हितैषी तो मेरा पिता धृतराष्ट्र भी नहीं!”
चेहरे पर मुस्कान और भीतर भरा क्रूर अंधकार—यही हस्त की पहचान है।
“कालमाधव का वास्तविक उद्धार उस दिन आरंभ होगा, जिस दिन वह आईने में स्वयं को देखकर यह स्वीकार कर लेगा कि वह ब्रम्हांड रूपी साम्राज्य का स्वामी नहीं, बल्कि उसी साम्राज्य का एक कुकुर मात्र है। दुर्भाग्य यह कि आईना दिखाने वाले पर ही वह भौंकने लगता है!”